भारतीय राजनीति का गिरता स्तर...!!!!

सौरभ पाल 
भारतीय राजनीति देश के स्वतंत्रता आन्दोलनो से उपजी हुई द्रोपदी के रूप में है |
जिसके स्वयंवर में उसे जीतने के लिए दूर दूर से सूरवीर आये है |
लेकिन अर्जुन को छोड़कर कोई रूप बदलकर क्यों नहीं आया है जब की बिना रूप बदले मछली की आँख में निशाना कैसे लगाया जा सकता है ??
परन्तु जब कोई वीर हैं साहसी है योग्य हैं तो रूप बदलने की क्या जरूरत आ पडी?
उसे तो विजय का वरण मैदान में आकर करना चाहिए न कि रूप बदलकर ~
खैर जो भी है परन्तु मछली की आँख पर निशाना लगाना ही योग्यता की निशानी है?
जब ध्यान मछली की आँख में है तब द्रौपदी को कैसे जीता जा सकेगा.?
इसका मतलब ध्यान कहीं और निशाना कहीं और वजह कुछ और क्या ये जीत की दूसरी सीढ़ी हैं ?
द्रोपदी को जीतकर आपस मे बन्दरबाट की क्या जरूरत आ पड़ी? और बिना किसी योग्यता परिक्षण के विभाजन करके हिस्सेदारी को जन्म दे दिया गया, हद तो तब हो गई जब इसे जुए में लगा दिया गया परन्तु विपक्ष ने द्रोपदी के बदले में क्या लगाया होगा
जो भी लगाया होगा निश्चित ही कीमत में बराबर ही होगा |
आखिर शकुनि जैसे लोगों की मुट्ठी में पांशे कैद हो चुके है और शकुनि ही निर्णायक बन चुका है और द्रोपदी रूपी राजनीति का भाग्यविधाता भी~~
पांसों को उछलने दो बस परिणाम तो आयेगा ही...........

सौरभ पाल
राजनीतिक विश्लेषक

Comments

  1. सटीक और सार्थक विश्लेषण विश्लेषक के गहन चिंतन का परिणाम है।

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  2. सटीक और सार्थक विश्लेषण विश्लेषक के गहन चिंतन का परिणाम है।

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